उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bahut qarib tha par mehrban na tha mera

बहुत क़रीब था पर मेहरबाँ न था मेरा

بہت قریب تھا پر مہرباں نہ تھا میرا

शायर: SabeenSaif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बहुत क़रीब था पर मेहरबाँ न था मेरा
भरी बहार में इक आशियाँ न था मेरा

लबादा रूह का छलनी था जा-ब-जा लेकिन
मिरे क़रीब कोई मेहरबाँ न था मेरा

लहू में बहता है लेकिन ये एहतियात-ए-जुनूँ
कि राज़ दिल का नज़र से 'अयाँ न था मेरा

मैं ख़ुश-गुमाँ जिसे जागीर समझे बैठी थी
कि दिल पे उस के कहीं भी निशाँ न था मेरा

वो दश्त-ए-ज़ात में बरगद का पेड़ था लेकिन
झुलसती धूप में वो साएबाँ न था मेरा

ये और बात मिरे हाल से था ना-वाक़िफ़
मैं कैसे कह दूँ कि वो राज़-दाँ न था मेरा

बना था तर्क-ए-त'अल्लुक़ का जो सबब ऐ 'सबीन'
क़सम ख़ुदा की वो हरगिज़ बयाँ न था मेरा