उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaam ka bhi Thikana nahin hai

काम का भी ठिकाना नहीं है

کام کا بھی ٹھکانا نہیں ہے

शायर: Onkar Singh Vivek7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

काम का भी ठिकाना नहीं है
और घर में भी दाना नहीं है

जानते हैं सज़ा ही वो देंगे
जुर्म तो कुछ बताना नहीं है

कह रही है हनक बादलों की
धूप ने मुँह दिखाना नहीं है

ख़ूँ जिगर का जलाए बिना कुछ
रंग शे'रों में आना नहीं है

आज़माइश में रखते हो कितनी
यार ये दोस्ताना नहीं है

गढ़ ही लेंगे वो सौ सौ बहाने
जिन को मिलना मिलाना नहीं है

ज़ीस्त में हौसलों ने हमारे
दबदबा ग़म का माना नहीं है