उर्दू शायरी · ग़ज़ल

juda jab tak teri zulfon se pech-o-KHam nahin honge

जुदा जब तक तिरी ज़ुल्फ़ों से पेच-ओ-ख़म नहीं होंगे

جدا جب تک تری زلفوں سے پیچ و خم نہیں ہوں گے

शायर: Kaleem Aajiz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जुदा जब तक तिरी ज़ुल्फ़ों से पेच-ओ-ख़म नहीं होंगे
सितम दुनिया में बढ़ते ही रहेंगे कम नहीं होंगे

दिल-ए-पुर-ग़म न होंगे दीदा-ए-पुर-नम नहीं होंगे
अंधेरा होगा उस महफ़िल में जिस में हम नहीं होंगे

दिलासे उन के जो दर्द-आश्ना-ए-ग़म नहीं होंगे
नमक ही होंगे दिल के ज़ख़्म पर मरहम नहीं होंगे

अगर बढ़ता रहा यूँही ये सौदा-ए-सितमगारी
तुम्ही रुस्वा सर-ए-बाज़ार होगे हम नहीं होंगे

जनाब-ए-शैख़ पर अफ़सोस है हम ने तो समझा था
हरम के रहने वाले ऐसे ना-महरम नहीं होंगे

इधर आओ तुम्हारी ज़ुल्फ़ हम आरास्ता कर दें
जो गेसू हम सँवारेंगे कभी बरहम नहीं होंगे

अगरचे 'इश्क़ में मरने का ख़तरा ही ज़ियादा है
मगर मरने के डर से मरने वाले कम नहीं होंगे