उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo zamane ko bahar-kaif dagha dete hain

जो ज़माने को बहर-कैफ़ दग़ा देते हैं

جو زمانے کو بہر کیف دغا دیتے ہیں

शायर: Om Prakash Laghar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो ज़माने को बहर-कैफ़ दग़ा देते हैं
क्या तमाशा है वही दर्स-ए-वफ़ा देते हैं

ज़िंदगी बोझ है ये बोझ उठाना है मुहाल
फिर भी मोहसिन मुझे जीने की दुआ देते हैं

ख़ून-ए-दिल ख़ून-ए-जिगर किस पे लुटाए कोई
अपने अपनों ही को जब ग़ैर बना देते हैं

लाला-ओ-गुल से मैं मंज़िल का पता क्यों पूछूँ
राह के ख़ार ही जब राह बता देते हैं

वक़्त के साथ बदल जाती है दुनिया की नज़र
वक़्त अच्छा हो तो दुश्मन भी दुआ देते हैं

ख़ैर गुज़री रह-ए-हस्ती में हैं 'लाग़र' तन्हा
लोग कहते हैं कि रहबर भी दग़ा देते हैं