उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo thamte the mera hath buDhe ho gae hain

जो थामते थे मिरा हाथ बूढ़े हो गए हैं

جو تھامتے تھے مرا ہاتھ بوڑھے ہو گئے ہیں

शायर: Faisal Saghar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो थामते थे मिरा हाथ बूढ़े हो गए हैं
तभी तो मेरे ख़यालात बूढ़े हो गए हैं

अब इस से बढ़ के हमें और आज़माएगा क्या
कि चलते चलते तिरे साथ बूढ़े हो गए हैं

हमारा बोझ उठाने से अब गुरेज़ाँ हैं
तुम्हारे अर्ज़-ओ-समावात बूढ़े हो गए हैं

सफ़र मज़ीद करेंगे तो गिर पड़ेंगे कहीं
कि आते-जाते ये दिन-रात बूढ़े हो गए हैं

जो मेरे सर की सफ़ेदी पे मुस्कुराते थे
बस एक रात रहे साथ बूढ़े हो गए हैं

मैं नस्ल-ए-नौ का इसे अलमिया समझता हूँ
शजर जवाँ हैं मगर पात बूढ़े हो गए हैं

तुम्हारी सम्त से इज़्न-ए-कलाम मिलता नहीं
मिरे लबों पे सवालात बूढ़े हो गए हैं