उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo sab ki KHair-KHwahi chahta hai

जो सब की ख़ैर-ख़्वाही चाहता है

جو سب کی خیر خواہی چاہتا ہے

शायर: Faisal Qadri Gunnauri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो सब की ख़ैर-ख़्वाही चाहता है
वो अपनी वाह-वाही चाहता है

फ़क़ीर-ए-वक़्त की ख़्वाहिश तो देखो
ये तख़्त-ए-बादशाही चाहता है

कभी मस्जिद का दरवाज़ा न देखा
मगर क़ुर्ब-ए-इलाही चाहता है

कर अंदर अपने पैदा ख़ाकसारी
अगर तू कज-कुलाही चाहता है

मयस्सर हो उसे भी मंज़िल-ए-‘इश्क़
मोहब्बत का ये राही चाहता है

मरीज़-ए-हिज्र को 'फ़ैसल' तलब क्या
ग़म-ए-दिल की दवा ही चाहता है