उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo mumkin ho to soz-e-shama parwane mein rakh dena

जो मुमकिन हो तो सोज़-ए-शम'अ परवाने में रख देना

جو ممکن ہو تو سوز شمع پروانے میں رکھ دینا

शायर: Qaisar Haideri Dehlvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो मुमकिन हो तो सोज़-ए-शम'अ परवाने में रख देना
अब इस अफ़्साने का उन्वान अफ़्साने में रख देना

बड़ी काफ़िर कशिश ईमाँ में है ऐ आज़िम-ए-का'बा
न ले जाना दिल अपने साथ बुत-ख़ाने में रख देना

मिरा दिल भी शराब-ए-इश्क़ से लबरेज़ है साक़ी
ये बोतल भी उड़ा कर काग मयख़ाने में रख देना

अभी आईना-ए-तस्वीर अभी हुश्यार अभी ग़ाफ़िल
तुम्हें आता है हर अंदाज़ दीवाने में रख देना

मिरा पैमाना-ए-हस्ती अगर साक़ी छलक जाए
मिरे हिस्से का ख़ाली जाम मयख़ाने में रख देना

शरीक-ए-मय जनाब-ए-शैख़ भी हो जाएँगे साक़ी
ज़रा ज़र्फ़-ए-वज़ू का ढंग पैमाने में रख देना

ये क्या दस्त-ए-अजल को काम सौंपा है मशिय्यत ने
चमन से तोड़ना फूल और वीराने में रख देना

वफ़ूर-ए-यास में 'क़ैसर' चले हैं दिल से चंद आँसू
ये लाशें हैं इन्हें आँखों के ख़स-ख़ाने में रख देना