उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo dekhte hain ghurub-e-aftab hote hue

जो देखते हैं ग़ुरूब-ए-आफ़्ताब होते हुए

جو دیکھتے ہیں غروب آفتاب ہوتے ہوئے

शायर: Naeem Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो देखते हैं ग़ुरूब-ए-आफ़्ताब होते हुए
हमें भी देखेंगे इक रोज़ ख़्वाब होते हुए

दयार-ए-'इश्क़ में हुस्न-ओ-शबाब होते हुए
दिए जलाए हैं क्यूँ माहताब होते हुए

जिन्हों ने अश्क हमारे लिए बहाए हैं
वो कैसे देखेंगे हम पर 'अज़ाब होते हुए

भटक रहे हैं जिहालत के तपते सहरा में
हमारे पास इक ऐसी किताब होते हुए

घिरी हुई है भला ज़ीस्त क्यूँ अँधेरों में
चराग़ होते हुए माहताब होते हुए

वो बख़्श देगा मुझे एक सच्ची तौबा पर
मिरे गुनाह बहुत बे-हिसाब होते हुए

ख़मोश बैठा रहा मैं लिहाज़ में उस के
हर एक बात का 'नजमी' जवाब होते हुए