उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab bhi hum fikr ke gulzar mein aa jate hain

जब भी हम फ़िक्र के गुलज़ार में आ जाते हैं

جب بھی ہم فکر کے گلزار میں آ جاتے ہیں

शायर: Naeem Najmi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब भी हम फ़िक्र के गुलज़ार में आ जाते हैं
लफ़्ज़ महके हुए अश'आर में आ जाते हैं

ये जो हम बज़्म-ए-अदाकार में आ जाते हैं
ऐसा लगता है कि बे-कार में आ जाते हैं

गो शिकस्ता ही सही धूप से बचने के लिए
हम भी इस साया-ए-दीवार में आ जाते हैं

कब से इक साथ नहीं बैठे हैं मिल कर हम लोग
ऐसा करते हैं कि इतवार में आ जाते हैं

ये सुना है कि यहाँ क़ीमतें लग जाती हैं
आओ हम भी इसी बाज़ार में आ जाते हैं

कितना पोशीदा रखें रोज़ की ख़बरों की तरह
'इश्क़ के क़िस्से तो अख़बार में आ जाते हैं

कोई ख़्वाहिश न तमन्ना है न फ़रियाद कोई
बे-सबब आप के दरबार में आ जाते हैं

लाख अहबाब से हम अपने छुपाएँ 'नजमी'
सानहे ज़ीस्त के अश'आर में आ जाते हैं