उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo chiDiya mere ghar aa ja rahi thi

जो चिड़िया मेरे घर आ जा रही थी

جو چڑیا میرے گھر آ جا رہی تھی

शायर: Fahmi Badayuni8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो चिड़िया मेरे घर आ जा रही थी
तुम्हारे घर से तिनके ला रही थी

बदन उस का भी गूँगा हो गया था
हमारी भी नज़र हकला रही थी

हवा ने क्यों बुझाया था दिये को
तिरी ख़ुश्बू मुझे समझा रही थी

मिरी आवाज़ पे क़ब्ज़ा जमा कर
ज़रूरत झूठ बोले जा रही थी

'इबादत के दरीचे खुल गए थे
मोहब्बत आ रही थी जा रही थी

कहा सीरत ने उस की नज़्म लिक्खो
मगर सूरत ग़ज़ल लिखवा रही थी

भँवर से बचने में कश्ती हमारी
मगरमच्छों में घिरती जा रही थी

मुसलसल बेचना पड़ती थीं ख़ुशियाँ
ग़मों पर इतनी लागत आ रही थी