उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo bhi chaha nahin mila mujhko

जो भी चाहा नहीं मिला मुझ को

جو بھی چاہا نہیں ملا مجھ کو

शायर: Danish Albela6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो भी चाहा नहीं मिला मुझ को
फिर भी कोई नहीं गिला मुझ को

रब पे सब कुछ मैं छोड़ बैठा हूँ
देगा बेहतर वही सिला मुझ को

कितना बेचैन करके रखता है
तेरी यादों का सिलसिला मुझ को

शिद्दत-ए-दर्द ख़त्म हो जाए
ज़हर का जाम ला पिला मुझ को

मैं गुल-ए-ख़ुश्क तेरी हिजरत में
आ मिरे पास और खिला मुझ को

मुझ को खोने के बा'द सोचोगे
मेरा 'दानिश' नहीं मिला मुझ को