उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jise hum DhunDte phirte rahe har ek mahfil mein

जिसे हम ढूँडते फिरते रहे हर एक महफ़िल में

جسے ہم ڈھونڈتے پھرتے رہے ہر ایک محفل میں

शायर: Vakeel Ahmad Hayat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिसे हम ढूँडते फिरते रहे हर एक महफ़िल में
शराब-ए-इश्क़ वो हम को मिली मय-ख़ाना-ए-दिल में

ये आँखें जब भी रोती हैं भिगो देती हैं आरिज़ को
बड़ा गहरा त'अल्लुक़ है समुंदर और साहिल में

जहाँ पर अद्ल का परचम हर इक परचम से ऊँचा हो
समझ लेना वही बेहतर क़बीला है क़बाइल में

मुझे तो शायरी करने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलती
उलझ जाता हूँ अक्सर मैं रियाज़ी के मसाइल में

हमीं ने देखी है तारीख़ की सब से बुरी हिजरत
दिलों से लोग निकले और बसे जा कर मोबाइल में

जो ये कहते हैं हम ने तो क़यामत को नहीं देखा
'हयात' उन से ये कहता है कभी झाँको मिरे दिल में