उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hijab mein habib hai ye ishq bhi ajib hai

हिजाब में हबीब है ये इश्क़ भी अजीब है

حجاب میں حبیب ہے یہ عشق بھی عجیب ہے

शायर: Vakeel Ahmad Hayat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हिजाब में हबीब है ये इश्क़ भी अजीब है
कि सामने रक़ीब है ये इश्क़ भी अजीब है

कभी उसे बुलाओ तुम कोई ग़ज़ल लिखाओ तुम
बहुत बड़ा अदीब है ये इश्क़ भी अजीब है

पड़ा हुआ अज़ल से है सुराग़-ए-दिल के पीछे जो
यही वो अंदलीब है ये इश्क़ भी अजीब है

मज़ा जो दर्द में है वो कहीं मुझे मिला नहीं
यही मिरा नसीब है ये इश्क़ भी अजीब है

ये आशिक़ों का मश्ग़ला ये आरिफ़ों का राज़ है
हकीम है अरीब है ये इश्क़ भी अजीब है

इबादतों में रात-दिन गुज़ारते थे जो कभी
गले में अब सलीब है ये इश्क़ भी अजीब है

फ़ना हुए हो इश्क़ में तो कोई ग़म नहीं 'हयात'
बक़ा भी अनक़रीब है ये इश्क़ भी अजीब है