उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jazba-e-shauq baDhata hai juda ho jaana

जज़्बा-ए-शौक़ बढ़ाता है जुदा हो जाना

جذبۂ شوق بڑھاتا ہے جدا ہو جانا

शायर: Chandar Bhan Kaifi Dehelvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जज़्बा-ए-शौक़ बढ़ाता है जुदा हो जाना
ऊपरी दिल से ज़रा मुझ से ख़फ़ा हो जाना

क़ौस सज्दे में झुकी रह गई जब से देखा
उन की अंगड़ाई का मेहराब-नुमा हो जाना

दम का क्या ठीक है दम-भर में है दम-भर में नहीं
चलते फिरते मिरी बालीं पे ज़रा हो जाना

मौसम-ए-गुल में उन्हें ग़ैर इधर ले आए
काम आया मिरे ज़ख़्मों का हरा हो जाना

बंद है 'इश्क़ के बंदों के लिए आज़ादी
क़ैद है क़ैद-ए-मोहब्बत से रिहा हो जाना

उन के तेवर भी ज़रा देखते रहना क़ासिद
ख़त के पुर्ज़े जो नज़र आएँ हवा हो जाना

खेल है हस्ती-ए-फ़ानी का दिगर-गूँ हो कर
नूर में नूर फ़ज़ाओं में फ़ज़ा हो जाना

कुछ तो ऐ रहमत-ए-साक़ी रहे 'कैफ़ी' का ख़याल
आ के मयख़ाने पे छाना तो घटा हो जाना