उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jalwa-e-hosh-ruba koi dikhaya jae

जल्वा-ए-होश-रुबा कोई दिखाया जाए

جلوۂ ہوش ربا کوئی دکھایا جائے

शायर: Charkh Chinioti9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जल्वा-ए-होश-रुबा कोई दिखाया जाए
'आलम-ए-शौक़ को दीवाना बनाया जाए

तू ने दुनिया ही बदल दी मिरे अरमानों की
ग़म-ए-दौराँ तुझे सीने से लगाया जाए

जागते जागते क़िस्मत को सुला बैठा हूँ
मिरी सोई हुई क़िस्मत को जगाया जाए

आओ ऐ ख़्वाब-गह-ए-नाज़ की नींदो कि तुम्हें
जागती रातों का अंदाज़ दिखाया जाए

हश्र को हश्र उठाने की ज़रूरत न रहे
हश्र से पहले कोई हश्र उठाया जाए

साज़-ए-दिल टूट गया वक़्त गया नग़्मों का
अब जवानी का कोई नौहा सुनाया जाए

आप जल्वों को समेटे हुए क्यों बैठे हैं
आबशारों की तरह नूर लुटाया जाए

मौजा-ए-ज़ुल्फ़-ए-मो'अम्बर का तक़ाज़ा है यही
निकहत-ओ-नूर का तूफ़ान उठाया जाए

'चर्ख़' वो मय-कदा-बर-दोश घटाएँ आईं
हुरमत-ए-तौबा को ख़ातिर में न लाया जाए