उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jaisa hun waisa kyun hun samjha sakta tha main

जैसा हूँ वैसा क्यूँ हूँ समझा सकता था मैं

جیسا ہوں ویسا کیوں ہوں سمجھا سکتا تھا میں

शायर: Iftikhar Arif5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जैसा हूँ वैसा क्यूँ हूँ समझा सकता था मैं
तुम ने पूछा तो होता बतला सकता था मैं

आसूदा रहने की ख़्वाहिश मार गई वर्ना
आगे और बहुत आगे तक जा सकता था मैं

छोटी-मोटी एक लहर ही थी मेरे अंदर
एक लहर से क्या तूफ़ान उठा सकता था मैं

कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शेर
इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं

जैसे सब लिखते रहते हैं ग़ज़लें नज़्में गीत
वैसे लिख लिख कर अम्बार लगा सकता था मैं