उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jahan par ahl-e-dil hote nahin hain

जहाँ पर अहल-ए-दिल होते नहीं हैं

جہاں پر اہل دل ہوتے نہیں ہیں

शायर: Badr Muneer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जहाँ पर अहल-ए-दिल होते नहीं हैं
रवय्ये मो'तदिल होते नहीं हैं

बहुत रखते हैं आवारा दिलों को
ये जज़्बे पा-ब-गिल होते नहीं हैं

फ़लक पर उड़ने वाले बादलों के
ठिकाने मुस्तक़िल होते नहीं हैं

हो बे-शक मुश्तरक दीवार लेकिन
मुक़द्दर मुत्तसिल होते नहीं हैं

दिल-ए-दर्द-आश्ना होता है जिन में
वो सीने मुज़्महिल होते नहीं हैं

सँभालो ख़ुद ही अपने रत-जगों को
ये विर्से मुंतक़िल होते नहीं हैं