उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jahan-e-ishq mein wo ba-waqar ho ke chale

जहान-ए-'इश्क़ में वो बा-वक़ार हो के चले

جہان عشق میں وہ با وقار ہو کے چلے

शायर: Charkh Chinioti9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जहान-ए-'इश्क़ में वो बा-वक़ार हो के चले
जो कू-ए-यार में सज्दा-गुज़ार हो के चले

वो अहल-ए-होश से पहले ही पा गए मंज़िल
जो राहवार-ए-जुनूँ पर सवार हो के चले

हवा कुछ ऐसी चली मिट गईं सभी क़द्रें
नुक़ूश-ए-माज़ी के गर्द-ओ-ग़ुबार हो के चले

ज़कात आप के हाथों से मिल गई जिन को
वो बे-नवा वो गदा शहर-यार हो के चले

ख़याल-ओ-ख़्वाब भी दिल भी नफ़स भी ईमाँ भी
जो सिलसिला भी चले नज़्र-ए-यार हो के चले

वो जिन को नाज़ था ईमान-ओ-ज़ोहद-ओ-तक़्वा पर
बुतों की एक झलक पर निसार हो के चले

तुम्हारे हुस्न की मा'सूमियत के क्या कहने
शिकार करने को आए शिकार हो के चले

नसीम तेरे शबिस्ताँ से हो के आई है
ये किस लिए न सरापा बहार हो के चले

बिखर के उड़ गए औराक़-ए-ज़िंदगी ऐ 'चर्ख़'
अजल के दोष पे हम भी सवार हो के चले