उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jabinon ko ba-sad taslim KHam dekha gaya hai

जबीनों को ब-सद तस्लीम ख़म देखा गया है

جبینوں کو بصد تسلیم خم دیکھا گیا ہے

शायर: Iftikhar Arif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जबीनों को ब-सद तस्लीम ख़म देखा गया है
बहुत ना-मुतमइन आँखों में नम देखा गया है

कहीं जा-ए-नमाज़-ए-शुक्र पर आँसू की इक बूँद
उसी क़तरे में दजला यम-ब-यम देखा गया है

सब आशुफ़्ता-सरों का एक ही ना'रा कि हम हैं
हम-आवाज़ों को दिल का हम-क़दम देखा गया है

बयाज़-ए-ख़्वाब-ए-रफ़्ता क्या 'अजब तरतीब पा जाए
किताब-ए-जाँ का शीराज़ा बहम देखा गया है

उधर उस चाँद तारे से ज़रा मशरिक़ की जानिब
सुबुक लगता हुआ परचम 'अलम देखा गया है

रफ़ू-ए-ज़ख्म-ए-देरीना की इक सूरत तो निकली
जिधर देखा नहीं था कम से कम देखा गया है

यहीं इक मंज़िल-ए-दुश्वार-ओ-ना-हमवार के बीच
कहीं इक जादा-ए-बे-पेच-ओ-ख़म देखा गया है