उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab talak sanson ko bu-e-dilruba milti rahi

जब तलक साँसों को बू-ए-दिलरुबा मिलती रही

جب تلک سانسوں کو بوئے دل ربا ملتی رہی

शायर: Laeeq Akbar Sahaab7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब तलक साँसों को बू-ए-दिलरुबा मिलती रही
चारागर से क़ल्ब-ए-मुज़्तर को दवा मिलती रही

जिस किसी से भी वफ़ा की बस जफ़ा मिलती रही
'उम्र भर जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा मिलती रही

हम गुज़रते हैं वहाँ से थाम कर क़ल्ब-ओ-जिगर
जिस गली जिस मोड़ पर वो मह-लक़ा मिलती रही

कितने नादाँ थे कि उस की जुस्तुजू करते रहे
जाने किस किस आश्ना से बे-वफ़ा मिलती रही

ज़िंदगी भर हर ख़ुशी बस बूँद भर मिलती रही
हर घड़ी रंज-ओ-अलम बन कर क़ज़ा मिलती रही

हम तड़पते ही रहे जिस की झलक के वास्ते
वो 'अदू से खोल के बंद-ए-क़बा मिलती रही

'ईद के दिन भी गले मिलता नहीं दिलबर 'सहाब'
बाँहों में भर-भर मुझे ख़ल्क़-ए-ख़ुदा मिलती रही