उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab sham hui dil ghabraya log uTh ke barae sair chale

जब शाम हुई दिल घबराया लोग उठ के बराए सैर चले

جب شام ہوئی دل گھبرایا لوگ اٹھ کے برائے سیر چلے

शायर: Habeeb Moosavi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब शाम हुई दिल घबराया लोग उठ के बराए सैर चले
तफ़तीश-ए-सनम को सू-ए-हरम हम जान के दिल में दैर चले

गो बहर-ए-अलम तूफ़ानी है हर मौज अदू-ए-जानी है
अब पाँव रुकेंगे क्या अपने इस दरिया को हम पैर चले

अब काम हमारा याँ क्या है ये आना जाना बेजा है
जिस वक़्त तुम्हारी सोहबत में हम हों और हुक्म-ए-ग़ैर चले

हम समझे थे याँ आएँगे दिन थोड़ा है रह जाएँगे
पर दिल की हसरत दिल में रही जब सू-ए-मकान-ए-ग़ैर चले

गो रंज-ए-जुदाई है दिल पर बे-वक़्त है ये दौर-ए-साग़र
बैठे हैं 'हबीब' अहबाब मगर अब तुम भी कह दो ख़ैर चले