उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bhala ho jis kaam mein kisi ka to us mein waqfa na kijiyega

भला हो जिस काम में किसी का तो उस में वक़्फ़ा न कीजिएगा

بھلا ہو جس کام میں کسی کا تو اس میں وقفہ نہ کیجئے گا

शायर: Habeeb Moosavi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

भला हो जिस काम में किसी का तो उस में वक़्फ़ा न कीजिएगा
ख़याल-ए-ज़हमत न कीजिएगा मलाल-ए-ईज़ा न कीजिएगा

वो मुझ से फ़रमा रहे हैं हँस कर हमेशा मिलने की आरज़ू पर
मलाल होगा मुहाल शय की कभी तमन्ना न कीजिएगा

हबाब है ज़िंदगी का नक़्शा कहाँ का दिन माह-ओ-साल कैसा
हवा है ये दम का क्या भरोसा उमीद-ए-फ़र्दा न कीजिएगा

किया तो है इश्क़ हज़रत-ए-दिल लिया है सर पर ये बार-ए-मुश्किल
हुआ अगर मुद्द'आ न हासिल तो राज़ इफ़्शा न कीजिएगा

जो आप आएँ पए 'अयादत यक़ीं है हो जाए मुझ को सेहत
मगर बराए-ख़ुदा ये ज़हमत कभी गवारा न कीजिएगा

जो अहल-ए-दुनिया के थे मुख़ालिफ़ हुए वो दुनिया के और न दीं के
समझिए अब ख़ात्मा है दीं का जो फ़िक्र-ए-दुनिया न कीजिएगा

ये क़ाएदा रस्म-ओ-राह का है ख़याल दोनों तरफ़ हो यकसाँ
किसी को पर्वा न होगी जिस दम किसी की पर्वा न कीजिएगा

त’अल्लुक़ अहल-ए-जहाँ से हो गर तो रखिए बीम-ओ-रजा बराबर
सिवा ख़ुदा के किसी के उपर कभी भरोसा न कीजिएगा

'अज़ीज़ है जौहर-ए-अमानत किसी से उल्फ़त हो या अदावत
अगर है कुछ ग़ैरत-ए-शराफ़त तो राज़ इफ़्शा न कीजिएगा

बयान की एहतियाज है कब रहा है सिर्फ़ एक हर्फ़-ए-मतलब
'हबीब' का दर्द-ए-दिल सुना सब अब इस का चारा न कीजिएगा