उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab raat ka aaseb bikhar jata hai mujh mein

जब रात का आसेब बिखर जाता है मुझ में

جب رات کا آسیب بکھر جاتا ہے مجھ میں

शायर: Qamar Abbas Qamar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब रात का आसेब बिखर जाता है मुझ में
अन्दर कोई बच्चा सा है डर जाता है मुझ में

दिल पर कहीं क़दमों के निशाँ तक नहीं मिलते
ये कौन है तेज़ी से गुज़र जाता है मुझ में

फिर ख़ुद ही बुझा देता है क़िंदील-ए-शब-ए-ग़म
फिर ख़ुद ही अचानक कहीं मर जाता है मुझ में

मौजें हैं परेशाँ मिरे तालाब-ए-बदन की
तू कैसी थकन ले के उतर जाता है मुझ में

इक ज़ख़्म को ये रात बना देती है सूरज
इक दर्द 'अलस्सुब्ह उभर जाता है मुझ में

मिट्टी का घड़ा हूँ सो चटख़ जाऊँगा इक दिन
बहने से ज़ियादा कोई भर जाता है मुझ में

इक लम्स बना देता है मुझ को मिरे जैसा
जब उस की हरारत का असर जाता है मुझ में