उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab makinon ko makin aaram de sakte nahin

जब मकीनों को मकीं आराम दे सकते नहीं

جب مکینوں کو مکیں آرام دے سکتے نہیں

शायर: Badr Muneer5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब मकीनों को मकीं आराम दे सकते नहीं
चार-दीवारी को घर का नाम दे सकते नहीं

ज़िंदगी ने बख़्श दी है वो ‘अदीम-उल-फ़ुर्सती
अब तो ख़ुद को अपने सुब्ह-ओ-शाम दे सकते नहीं

शामत-ए-आ’माल से हम पर मुसल्लत हो गया
हम अमीर-ए-शहर को इल्ज़ाम दे सकते नहीं

दोस्तो करते रहेंगे आप के हक़ में दु'आ
और तो ख़िदमत कोई अंजाम दे सकते नहीं

पल रहे हैं कितने बच्चे रूखी-सूखी पर 'मुनीर'
हम उन्हें चिल्ग़ोज़ा-ओ-बादाम दे सकते नहीं