उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab juda hum tum hue the mausam-e-dil zard tha

जब जुदा हम तुम हुए थे मौसम-ए-दिल ज़र्द था

جب جدا ہم تم ہوئے تھے موسم دل زرد تھا

शायर: Laeeq Akbar Sahaab7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब जुदा हम तुम हुए थे मौसम-ए-दिल ज़र्द था
आँखों में थी ग़म की रिम-झिम जाँ का सूरज सर्द था

कुछ बरस पहले तलक याँ हर कोई हमदर्द था
एक दूजे के लिए सब के दिलों में दर्द था

जब बिसात-ए-ज़िंदगी पर वक़्त ने बाज़ी चली
मात उस ने दी मुझे जो मेरे घर का फ़र्द था

शहर-ए-जाँ के बाम-ओ-दर इक शख़्स उलट कर चल दिया
हो न हो वो दुश्मन-ए-जाँ कोई दहशत-गर्द था

ख़ाक-ओ-ख़ूँ में डूब कर अपना वतन हासिल हुआ
आबला-पा थे मगर पुर-अज़्म हर इक फ़र्द था

चाह बैठा था जिसे मैं जान कर इक आइना
हाए सद-अफ़्सोस कि वो आइने की गर्द था

'अक्स हरजाई मिटा आईना-ए-दिल से 'सहाब'
वे सितमगर बे-मुरव्वत बेवफ़ा बे-दर्द था