उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab hasti-e-kaunain tere gham mein miTa di

जब हस्ती-ए-कौनैन तिरे ग़म में मिटा दी

جب ہستیٔ کونین ترے غم میں مٹا دی

शायर: Vahshi Kanpuri4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब हस्ती-ए-कौनैन तिरे ग़म में मिटा दी
हर पर्दा-ए-हस्ती से मुझे तू ने सदा दी

रूदाद मिरे ग़म की उन्हें किस ने सुना दी
भड़की थी उधर आग इधर किस ने लगा दी

अंजाम-ए-ग़म-ए-इश्क़ जो पूछा तो सबा ने
कुछ ख़ाक पतंगों की सर-ए-बज़्म उड़ा दी

हर शैख़-ओ-बरहमन को रह-ए-इश्क़ दिखा कर
वहशी ने हद-ए-का'बा-ओ-बुत-ख़ाना मिटा दी