उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jaane kya kahte hue sarw saman guzre hain

जाने क्या कहते हुए सर्व समन गुज़रे हैं

جانے کیا کہتے ہوئے سرو سمن گزرے ہیں

शायर: Vazahat Nseem7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जाने क्या कहते हुए सर्व समन गुज़रे हैं
कैसे हालात से गुल ज़ेर-ए-चमन गुज़रे हैं

अब बताओ कि मुलाक़ात भली या फ़ुर्क़त
तुम पे ये हिज्र के लम्हे जो कठिन गुज़रे हैं

चाँदनी रात में दो साए ब-सद-हुस्न-ए-ख़िराम
इन दरख़्तों के तले महव-ए-सुख़न गुज़रे हैं

उस पे ये नूर है देखोगे तो हैरत होगी
चाँद पर आज तलक जितने गहन गुज़रे हैं

जज़्बा-ए-शौक़ है भरपूर है और सच्चा है
सारे सहराओं से दीवाने मगन गुज़रे हैं

दौलत-ए-दर्द फ़क़त उस की इनायत ही नहीं
और जानिब से भी कुछ रंज-ओ-मेहन गुज़रे हैं

बद-गुमाँ लफ़्ज़ थे मश्कूक सदाएँ थीं 'नसीम'
इस समाअ'त पे कुछ ऐसे भी सुख़न गुज़रे हैं