उर्दू शायरी · ग़ज़ल

guzishta waqt ki har baat aani jaani hui

गुज़िश्ता वक़्त की हर बात आनी जानी हुई

گزشتہ وقت کی ہر بات آنی جانی ہوئی

शायर: Vazahat Nseem6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुज़िश्ता वक़्त की हर बात आनी जानी हुई
ये बात अगले सफ़र की नई निशानी हुई

लगा के बैठ गए शर्त दस्त-ओ-बाज़ू की
अगरचे दिल में है पहले से हार मानी हुई

जुदा किया है उसे आप ही तो चुप क्यों हो
भला ये कौन से जज़्बे की तर्जुमानी हुई

उसे फिर और किसी शेर में कहा न गया
जो बात आप से पिछले दिनों ज़बानी हुई

सुनाए जाएँ अगर कोई सुनने वाला हो
किसी की याद हमारे लिए कहानी हुई

बदल गया है चलन शहर-ए-आरज़ू का 'नसीम'
इस अहद-ए-नौ में तुम्हारी वफ़ा पुरानी हुई