उर्दू शायरी · ग़ज़ल

izhaar-e-sadaqat mein asar kyon nahin hota

इज़हार-ए-सदाक़त में असर क्यों नहीं होता

اظہار صداقت میں اثر کیوں نہیں ہوتا

शायर: Ehsan Danish Kandhlvi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इज़हार-ए-सदाक़त में असर क्यों नहीं होता
अब मेरी तरफ़ उन का गुज़र क्यों नहीं होता

ख़ुशबू का ये बिखराव भी तौहीन-ए-चमन है
एहसास तुझे बाद-ए-सहर क्यों नहीं होता

क्यों फ़िक्र से महरूम हैं इस दौर की नस्लें
पहला सा ज़बानों में असर क्यों नहीं होता

जो बात इधर है वो उधर क्यों नहीं जाती
जो कर्ब इधर है वो उधर क्यों नहीं होता

इस शहर-ए-ज़बूँ-हाल में तख़रीब का एहसास
होना तो ज़रूरी है मगर क्यों नहीं होता

फ़नकार इसी कश्मकश-ए-वक़्त में गुम हैं
बाज़ार ख़रीदार-ए-हुनर क्यों नहीं होता

अल्लाह को करते हैं मुसीबत में सभी याद
ये विर्द मगर शाम-ओ-सहर क्यों नहीं होता

ख़ुद-बीं हैं सभी और ये बताने से हैं मा'ज़ूर
आईने से नुक़्सान-ए-नज़र क्यों नहीं होता

पेशानी-ए-कोहसार पे सूरज का है मीलाद
वादी में मगर शोर-ए-सहर क्यों नहीं होता

हो जिस के पयम्बर का गुज़र ‘अर्श-ए-बरीं पर
उम्मत का सितारों में सफ़र क्यों नहीं होता

हैराँ हूँ कि 'इक़बाल' की ता'लीम का 'दानिश'
इस शहर के लोगों पे असर क्यों नहीं होता