उर्दू शायरी · ग़ज़ल

inhin mein jite inhin bastiyon mein mar rahte

इन्हीं में जीते इन्हीं बस्तियों में मर रहते

انہیں میں جیتے انہیں بستیوں میں مر رہتے

शायर: Iftikhar Arif5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इन्हीं में जीते इन्हीं बस्तियों में मर रहते
ये चाहते थे मगर किस के नाम पर रहते

पयम्बरों से ज़मीनें वफ़ा नहीं करतीं
हम ऐसे कौन ख़ुदा थे कि अपने घर रहते

परिंदे जाते न जाते पलट के घर अपने
पर अपने हम-शजरों से तो बा-ख़बर रहते

बस एक ख़ाक का एहसान है कि ख़ैर से हैं
वगर्ना सूरत-ए-ख़ाशाक दर-ब-दर रहते

मिरे करीम जो तेरी रज़ा मगर इस बार
बरस गुज़र गए शाख़ों को बे-समर रहते