उर्दू शायरी · ग़ज़ल

husn jo lab kusha hua ghunche chaTak chaTak gae

हुस्न जो लब कुशा हुआ ग़ुंचे चटक चटक गए

حسن جو لب کشا ہوا غنچے چٹک چٹک گئے

शायर: Raaz Muradabadi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुस्न जो लब कुशा हुआ ग़ुंचे चटक चटक गए
हम तो हरीम-ए-नाज़ में आज बहक बहक गए

गर्मी-ए-चश्म-ए-मस्त से शीशे दरक दरक गए
जाम छलक छलक गए रिंद बहक बहक गए

हुस्न की बारगाह में कह न सके हदीस-ए-ग़म
आँख उठी न लब हिले हम ही झिजक झिजक गए

उस से बिछड़ के 'उम्र भर फिरते रहे हैं दर-ब-दर
मंज़िलें सर हुईं मगर राह भटक भटक गए

आई जो मुद्दतों के बा'द उस बुत-ए-हीला-जू की याद
ज़ब्त के बावजूद 'राज़' अश्क टपक टपक गए