उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haTi zulf un ke chehre se magar aahista aahista

हटी ज़ुल्फ़ उन के चेहरे से मगर आहिस्ता आहिस्ता

ہٹی زلف ان کے چہرے سے مگر آہستہ آہستہ

शायर: Qamar Jalalvi12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हटी ज़ुल्फ़ उन के चेहरे से मगर आहिस्ता आहिस्ता
अयाँ सूरज हुआ वक़्त-ए-सहर आहिस्ता आहिस्ता

चटक कर दी सदा ग़ुंचे ने शाख़-ए-गुल की जुम्बिश पर
ये गुलशन है ज़रा बाद-ए-सहर आहिस्ता आहिस्ता

क़फ़स में देख कर बाज़ू असीर आपस में कहते हैं
बहार-ए-गुल तक आ जाएँगे पर आहिस्ता आहिस्ता

कोई छुप जाएगा बीमार-ए-शाम-ए-हिज्र का मरना
पहुँच जाएगी उन तक भी ख़बर आहिस्ता आहिस्ता

ग़म-ए-तब्दीली-ए-गुलशन कहाँ तक फिर ये गुलशन है
क़फ़स भी हो तो बन जाता है घर आहिस्ता आहिस्ता

हमारे बाग़बाँ ने कह दिया गुलचीं के शिकवे पर
नए अश्जार भी देंगे समर आहिस्ता आहिस्ता

इलाही कौन सा वक़्त आ गया बीमार-ए-फ़ुर्क़त पर
कि उठ कर चल दिए सब चारा-गर आहिस्ता आहिस्ता

न जाने क्यूँ न आया वर्ना अब तक कब का आ जाता
अगर चलता वहाँ से नामा-बर आहिस्ता आहिस्ता

ख़फ़ा भी हैं इरादा भी है शायद बात करने का
वो चल निकले हैं मुझ को देख कर आहिस्ता आहिस्ता

जवानी आ गई दिल छेदने की बढ़ गईं मश्क़ें
चलाना आ गया तीर-ए-नज़र आहिस्ता आहिस्ता

जिसे अब देख कर इक जान पड़ती है मोहब्बत में
यही बन जाएगी क़ातिल नज़र आहिस्ता आहिस्ता

अभी तक याद है कल की शब-ए-ग़म और तन्हाई
फिर इस पर चाँद का ढलना 'क़मर' आहिस्ता आहिस्ता