उर्दू शायरी · ग़ज़ल

harim-e-lafz mein kis darja be-adab nikla

हरीम-ए-लफ़्ज़ में किस दर्जा बे-अदब निकला

حریم لفظ میں کس درجہ بے ادب نکلا

शायर: Iftikhar Arif5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हरीम-ए-लफ़्ज़ में किस दर्जा बे-अदब निकला
जिसे नजीब समझते थे कम-नसब निकला

सिपाह-ए-शाम के नेज़े पे आफ़्ताब का सर
किस एहतिमाम से परवर-दिगार-ए-शब निकला

हमारी गर्मी-ए-गुफ़्तार भी रही बे-सूद
किसी की चुप का भी मतलब अजब अजब निकला

बहम हुए भी मगर दिल की वहशतें न गईं
विसाल में भी दिलों का ग़ुबार कब निकला

अभी उठा भी नहीं था किसी का दस्त-ए-करम
कि सारा शहर लिए कासा-ए-तलब निकला