उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har shaKHs yahan mujhko bimar sa lagta hai

हर शख़्स यहाँ मुझ को बीमार सा लगता है

ہر شخص یہاں مجھ کو بیمار سا لگتا ہے

शायर: Hafeez Shahid8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर शख़्स यहाँ मुझ को बीमार सा लगता है
इस शहर में अब जीना आज़ार सा लगता है

सोचों की दुकानें हैं यादों के खिलौने हैं
सीने में मिरे कोई बाज़ार सा लगता है

देखा तुम्हें जब से एहसास के आँगन में
हर जज़्बा-ए-ख़्वाबीदा बेदार सा लगता है

अब राह-ए-मोहब्बत में चलना है बहुत मुश्किल
इस राह का हर पत्थर कोहसार सा लगता है

माना कि तिरे लब पर अल्फ़ाज़ तो अच्छे हैं
लेकिन ये तिरा लहजा तलवार सा लगता है

कुछ शहर के दुखड़े हैं कुछ घर के मसाइल हैं
मुझ को ये तिरा ख़त भी अख़बार सा लगता है

हालात ने भर दी है तल्ख़ी सी तबीअत में
अब कार-ए-सुख़न-साज़ी दुश्वार सा लगता है

दर-अस्ल वो कैसा है ये बा'द की बातें हैं
चेहरे से मगर 'शाहिद' ग़म-ख़्वार सा लगता है