उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har samt zindagi ka tamasha bhi KHub hai

हर सम्त ज़िंदगी का तमाशा भी ख़ूब है

ہر سمت زندگی کا تماشا بھی خوب ہے

शायर: Hafeez Shahid7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर सम्त ज़िंदगी का तमाशा भी ख़ूब है
दुनिया भी ख़ूब रौनक़-ए-दुनिया भी ख़ूब है

जिस शहर में किसी को किसी की ख़बर नहीं
उस शहर-ए-ला-जवाब में जीना भी ख़ूब है

मय-ख़ाना-ए-हयात का अहवाल क्या लिखूँ
साक़ी भी ख़ूब साग़र-ए-सहबा भी ख़ूब है

पी कर शराब गुम मैं रहूँ अपने होश में
ऐ ज़िंदगी ये तेरा तक़ाज़ा भी ख़ूब है

देखा है मैं ने उस के ज़ियाँ में भी फ़ाएदा
बाज़ार-ए-आरज़ू का ख़सारा भी ख़ूब है

होती है अव्वलीं ही मुलाक़ात-ए-आख़िरी
इंसान का ये मौत से रिश्ता भी ख़ूब है

मुद्दत से चल रहा हूँ मगर तय न कर सका
'शाहिद' ये राह-ए-रास्त तमन्ना भी ख़ूब है