उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ek ruKH se kahan raushni nikalti hai

हर एक रुख़ से कहाँ रौशनी निकलती है

ہر ایک رخ سے کہاں روشنی نکلتی ہے

शायर: Umair Samar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर एक रुख़ से कहाँ रौशनी निकलती है
दियों के जिस्म से भी तीरगी निकलती है

हमारे लोगों से पूछो है तिश्नगी क्या शय
तुम्हारे शहर से हो कर नदी निकलती है

दिखाई देते हैं फीके ये हुस्न वाले भी
दुपट्टा ओढ़ के जब सादगी निकलती है

तुम्हारा नाम जो सुनता हूँ ग़ैर के लब से
मैं क्या बताऊँ मिरी जान सी निकलती है

ये लग रहा है कि तुम ने भी देख ली दुनिया
तुम्हारे चेहरे से संजीदगी निकलती है

पलक झपकने कि मोहलत भी मिल नहीं पाती
किसी के हाथ से जब ज़िंदगी निकलती है