उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har daricha dhuan ugalta hai

हर दरीचा धुआँ उगलता है

ہر دریچہ دھواں اگلتا ہے

शायर: Hafeez Momin5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर दरीचा धुआँ उगलता है
बंद कमरे में कौन जलता है

च्यूँटियों के भी पर निकल आए
कौन पैदल ज़मीं पे चलता है

आसमाँ छू नहीं सकेगा कभी
रोज़ दिया मगर उछलता है

रेंगती है तुम्हारी मुन्नी ख़ूब
मेरा मुन्ना भी पाँव चलता है

बीत जाती है हर घड़ी 'मोमिन'
वक़्त टाले बग़ैर टलता है