उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haqiqat ko ajab andaz se jhuThlaya jata hai

हक़ीक़त को अजब अंदाज़ से झुठलाया जाता है

حقیقت کو عجب انداز سے جھٹلایا جاتا ہے

शायर: Om Prakash Laghar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हक़ीक़त को अजब अंदाज़ से झुठलाया जाता है
ज़माने को ख़ुदा के नाम पर बहकाया जाता है

तअ'ल्लुक़ रहनुमा का मुफ़लिस-ओ-नादार से कैसा
उन्हें वोटों की ख़ातिर वक़्त पर फुस्लाया जाता है

कहीं मेरी शराफ़त को न कमज़ोरी समझ बैठे
कभी दुश्मन को भी इस वास्ते धमकाया जाता है

अगरचे हर नए दिन का नया अंदाज़ है लेकिन
कभी अफ़्साना-ए-पारीना भी दोहराया जाता है

अगर जज़्बात ज़ख़्मी हों तो होगा फ़िक्र भी ज़ख़्मी
यही तारीख़ के औराक़ में भी पाया जाता है

ये रुत्बा हर किसी को कू-ए-जानाँ में नहीं मिलता
कोई मंसूर हो तो दार पर लटकाया जाता है