उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haq wafaon ka jafaon se ada karte hain log

हक़ वफ़ाओं का जफ़ाओं से अदा करते हैं लोग

حق وفاؤں کا جفاؤں سے ادا کرتے ہیں لوگ

शायर: Qadir Siddiqi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हक़ वफ़ाओं का जफ़ाओं से अदा करते हैं लोग
आज की दुनिया को क्या कहिए कि क्या करते हैं लोग

आँख पुर-नम होंट लर्ज़ां दिल ग़मों से पाश पाश
इस तरह भी ज़िंदगी का सामना करते हैं लोग

ऐ ज़माने की रविश तेरी वफ़ा-कोशी की ख़ैर
अहद-ओ-पैमाँ तोड़ कर वा'दा वफ़ा करते हैं लोग

ऐ वफ़ूर-ए-ज़िंदगी ये भी तिरा ए'जाज़ है
ज़हर पीते हैं मुसलसल और जिया करते हैं लोग

उतना उतना दिल में उठता है बग़ावत का ग़ुबार
जितना जितना दिल को पाबंद-ए-वफ़ा करते हैं लोग

उस के पाने की मसर्रत चंद लम्हे भी नहीं
जिस को खो कर उम्र भर आह-ओ-बुका करते हैं लोग

मेरी रूदाद-ए-अलम में कोई पहलू है ज़रूर
सुन के रूदाद-ए-अलम क्यों हँस दिया करते हैं लोग

जब भी होता है जफ़ाओं का कहीं भी तज़्किरा
नाम जाने क्यों तुम्हारा ले लिया करते हैं लोग

सुब्ह-ए-नौ की याद में कटती है हर शाम-ए-फ़िराक़
सुख की उम्मीदों में अक्सर दुख सहा करते हैं लोग

रंज-ओ-ग़म ऐश-ओ-मसर्रत धूप भी है छाँव भी
हँसते हँसते ज़िंदगी में रो दिया करते हैं लोग

कौन काम आता है आड़े वक़्त पर 'क़ादिर' ये देख
ज़ीस्त के हर मोड़ पर यूँ तो मिला करते हैं लोग