उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamin jaise bina patwar dariya par karte hain

हमीं जैसे बिना पतवार दरिया पार करते हैं

ہمیں جیسے بنا پتوار دریا پار کرتے ہیں

शायर: Charan Singh Bashar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमीं जैसे बिना पतवार दरिया पार करते हैं
वो क्या मौजों से टकराएँगे जो पानी से डरते हैं

उन्हीं को ऐ वतन क्यों हाशिए पे रक्खा जाता है
तिरी सूरत में जो ख़ून-ए-जिगर से रंग भरते हैं

अगर ज़िंदा ही रहना है तो रहिए अपनी शर्तों पर
कि ख़ुद्दारी से ख़ाली लोग सौ सौ बार मरते हैं

ग़नीमत है बचा रक्खा है हम ने रंग-ओ-ख़ुशबू को
कि हम वो फूल हैं जो रोज़ शो'लों से गुज़रते हैं

'बशर' सच बोलने वालों को कोई क्या डराएगा
जो डरते हैं ख़ुदा से वो कहाँ दुनिया से डरते हैं