उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apne masum gunahon ki saza kya mangen

अपने मा'सूम गुनाहों की सज़ा क्या माँगें

اپنے معصوم گناہوں کی سزا کیا مانگیں

शायर: Charan Singh Bashar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपने मा'सूम गुनाहों की सज़ा क्या माँगें
दोस्तो तुम से वफ़ाओं का सिला क्या माँगें

हाथ दुनिया तिरे आगे न कभी फैलेगा
देने वाला है ख़ुदा तुझ से भला क्या माँगें

जान दे कर भी न मिल पाई कहीं बू-ए-वफ़ा
है हमें ख़ुद से गिला तुझ से वफ़ा क्या माँगें

कोई सूरज ही नया निकले तो दिन निकलेगा
बुझ रहे हैं जो दिए उन से ज़िया क्या माँगें

उस पे तो सारे ही दरवाज़े हुए बंद 'बशर'
हाथ उठाए तो हैं सोचे हैं दु'आ क्या माँगें