उर्दू शायरी · ग़ज़ल

faza-e-admiyyat ko sanwarne hi nahin dete

फ़ज़ा-ए-आदमियत को सँवरने ही नहीं देते

فضائے آدمیت کو سنورنے ہی نہیں دیتے

शायर: Charan Singh Bashar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस शीर्षक की यह संग्रह प्रविष्टि 2 है। समान शीर्षक के रिकॉर्ड में पाठ या श्रेय का अंतर है; इसे स्वतंत्र आधिकारिक संस्करण का दावा न मानें। अन्य संग्रह प्रविष्टि 1

फ़ज़ा-ए-आदमियत को सँवरने ही नहीं देते
सियासत-दाँ दिलों के ज़ख़्म भरने ही नहीं देते

ज़माना वो भी था जब हादसे का डर सताता था
मगर अब हादसे लोगों को डरने ही नहीं देते

कुछ ऐसे ख़्वाब हम ने पाल रक्खे हैं कि जो हम को
हक़ीक़त की ज़मीं पर पाँव धरने ही नहीं देते

ये माना 'इश्क़ से बनती है जन्नत ज़िंदगी लेकिन
मसाइल ज़िंदगी के 'इश्क़ करने ही नहीं देते

गुज़रगाहों के आगे मंज़िलें आवाज़ देती हैं
मगर ठहरे हुए लम्हे गुज़रने ही नहीं देते

'बशर' बे-रहम हैं ये पर्बतों जैसे उसूल अपने
किसी के दिल की वादी में उतरने ही नहीं देते