उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ham-shakl kah diya tha ruKH-e-la-jawab ka

हम-शक्ल कह दिया था रुख़-ए-ला-जवाब का

ہم شکل کہہ دیا تھا رخ لا جواب کا

शायर: Qamar Jalalvi13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम-शक्ल कह दिया था रुख़-ए-ला-जवाब का
अब आसमान पर है दिमाग़ आफ़्ताब का

कम कर दे नूर काम नहीं है नक़ाब का
छुपता नहीं ग़ुबार से मुँह आफ़्ताब का

ये हुस्न एक मंज़र-ए-दिल-कश है ख़्वाब का
सरकार ए'तिबार न कीजे शबाब का

आईना ला के रख दिया आज उन के सामने
क़ाइल बना दिया निगह-ए-इंतिख़ाब का

क्या हाल कर दिया है मिरा मुझ को देख लो
तुम क्या करोगे इस दिल-ए-ख़ाना-ख़राब का

वो क्या हैं आज उन के फ़रिश्ते भी आएँगे
वा'दे की शब नहीं है ये दिन है हिसाब का

क्या ख़ूब कम-सिनी में तुम्हें इंतिज़ार-ए-हश्र
और हश्र मुंतज़िर है तुम्हारे शबाब का

दुनिया खड़ी है उन की ज़ियारत के वास्ते
महशर बना हुआ है ज़माना शबाब का

वो बे-हिजाब और भला मेरे सामने
ये कहिए बंद टूट गया है नक़ाब का

हसरत से देखता है तबीबों का मुँह मरीज़
शायद समझ गया है इशारा जवाब का

सय्याद सामने से हटा ले ज़रा क़फ़स
घर जल रहा है बुलबुल-ए-ख़ाना-ख़राब का

पोंछे हैं अश्क दामन-ए-दरिया से मौज ने
देखा गया न फूट के रोना हबाब का

शक था जो काफ़िरों को नबुव्वत में ऐ 'क़मर'
शाहिद मैं ही बना था रिसालत-मआ'ब का