उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum phire shahr mein aawara-o-ruswa barson

हम फिरे शहर में आवारा-ओ-रूस्वा बरसों

ہم پھرے شہر میں آوارہ و رسوا برسوں

शायर: Qadir Siddiqi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम फिरे शहर में आवारा-ओ-रूस्वा बरसों
दिल के मंदिर में तिरे वहम को पूजा बरसों

वो बदन चाँद के जैसा था मिरे अक्स के साथ
दिन की रौनक़ में भी इक ख़्वाब सा देखा बरसों

क़ुर्ब ने खोल दिए हुस्न के उक़्दे सारे
ज़िंदगी खाती रही इश्क़ का धोका बरसों

अब तो हँसने की इजाज़त ग़म-ए-दौराँ दे दे
वक़्त रो रो के बहुत हम ने गुज़ारा बरसों

कोई ऐसा न मिला जिस से ख़बर कुछ मिलती
अपना हाल अपनी ही तस्वीर से पूछा बरसों

अब नहीं ताब कि सदमात की यूरिश झेले
तल्ख़ियाँ होती रहीं दिल को गवारा बरसों

ये अलग बात कि रास आया तिरा ग़म हम को
वर्ना घेरे रहा यूँ तो ग़म-ए-दुनिया बरसों

उस से पूछो कि है क्या कैफ़-ए-शिकस्त-ए-उम्मीद
जिस ने झेला है ग़म-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा बरसों

एक मासूम लगावट थी कि जिस की ख़ातिर
दिल को मर्ग़ूब रही रंजिश-ए-बेजा बरसों

तुम कि हर साँस में हर आह में हर ख़्वाब में थे
फिर भी हम अपने को पाते रहे तन्हा बरसों

अक़्ल सुलझा न सकी उलझे मसाइल 'क़ादिर'
आँख ने देखा है क़िस्मत का तमाशा बरसों