उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum par nigah-e-lutf kabhi hai kabhi nahin

हम पर निगाह-ए-लुत्फ़ कभी है कभी नहीं

ہم پر نگاہ لطف کبھی ہے کبھی نہیں

शायर: Pandit Vidya Ratan Aasi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस शीर्षक की यह संग्रह प्रविष्टि 2 है। समान शीर्षक के रिकॉर्ड में पाठ या श्रेय का अंतर है; इसे स्वतंत्र आधिकारिक संस्करण का दावा न मानें। अन्य संग्रह प्रविष्टि 1

हम पर निगाह-ए-लुत्फ़ कभी है कभी नहीं
तुम ही कहो ये क्या है मगर दिल-लगी नहीं

गो जी रहा है आज भी कोई तिरे बग़ैर
लेकिन ये ज़िंदगी तो कोई ज़िंदगी नहीं

उस की बला से कोई जिए या कोई मरे
जिस को किसी के दर्द का एहसास ही नहीं

दिल में न आरज़ू है कोई अब न वलवला
इक शाम जल रही है मगर रौशनी नहीं

आख़िर हम उन के वा'दों पर ईमान लाएँ क्या
जो हम पे मेहरबान अभी हैं अभी नहीं

इस गुफ़्तुगू की तर्ज़ में तरमीम कीजिए
कब तक मैं ख़ामुशी से सुनूँ आप की नहीं

'आसी' ज़बान-ए-ख़ामुशी में दास्तान-ए-शौक़
हम ने कही है बारहा उस ने सुनी नहीं