उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum kahan apni mohabbat mein KHalal chahte hain

हम कहाँ अपनी मोहब्बत में ख़लल चाहते हैं

ہم کہاں اپنی محبت میں خلل چاہتے ہیں

शायर: Faisal Qadri Gunnauri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम कहाँ अपनी मोहब्बत में ख़लल चाहते हैं
आप हर बात पे क्यों रद्द-ए-‘अमल चाहते हैं

'इश्क़ अंजाम को पहुँचे तो सिला मिलता है
आप आग़ाज़-ए-मोहब्बत में ही फल चाहते हैं

आज का दौर मुबारक हो तुम्हीं को लोगो
हम तो अपना वही गुज़रा हुआ कल चाहते हैं

हम से दीवानों की हसरत ही नहीं इस के सिवा
हम तो महबूब के क़दमों में अजल चाहते हैं

क्या ख़बर फिर से मुलाक़ात हुई या न हुई
हम तिरे क़ुर्ब के बस एक दो पल चाहते हैं

जाने वाले तू हमें कोई निशानी दे जा
हम बसाना तिरी यादों का महल चाहते हैं

अब तो नादान तबी'अत को सँभालो 'फ़ैसल'
अपने हालात भी अब रद्द-ओ-बदल चाहते हैं