उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum apne raftagan ko yaad rakhna chahte hain

हम अपने रफ़्तगाँ को याद रखना चाहते हैं

ہم اپنے رفتگاں کو یاد رکھنا چاہتے ہیں

शायर: Iftikhar Arif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम अपने रफ़्तगाँ को याद रखना चाहते हैं
दिलों को दर्द से आबाद रखना चाहते हैं

मुबादा मुंदमिल ज़ख़्मों की सूरत भूल ही जाएँ
अभी कुछ दिन ये घर बरबाद रखना चाहते हैं

बहुत रौनक़ थी उन के दम क़दम से शहर-ए-जाँ में
वही रौनक़ हम उन के बा'द रखना चाहते हैं

बहुत मुश्किल ज़मानों में भी हम अहल-ए-मोहब्बत
वफ़ा पर इश्क़ की बुनियाद रखना चाहते हैं

सरों में एक ही सौदा कि लौ देने लगे ख़ाक
उमीदें हस्ब-ए-इस्तेदाद रखना चाहते हैं

कहीं ऐसा न हो हर्फ़-ए-दुआ मफ़्हूम खो दे
दुआ को सूरत-ए-फ़रियाद रखना चाहते हैं

क़लम आलूदा-ए-नान-ओ-नमक रहता है फिर भी
जहाँ तक हो सके आज़ाद रखना चाहते हैं