उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hain waqt ke mahkum to bahkenge qadam aur

हैं वक़्त के महकूम तो बहकेंगे क़दम और

ہیں وقت کے محکوم تو بہکیں گے قدم اور

शायर: Qaisar Haideri Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हैं वक़्त के महकूम तो बहकेंगे क़दम और
बदले हुए हालात में खो जाएँगे हम और

अफ़्साना-ए-अंदोह में यकसाँ है हर इक शख़्स
इस दौर-ए-पुर-आशोब में तुम और न हम और

ले जाते हैं बुत-ख़ाने से दिल अपना जला कर
रख लेंगे नई शम्अ' सर-ए-ताक़-ए-हरम और

हर शख़्स था ख़ामोश मिरे बा'द अज़ल में
पूछा जो गया है कोई शाइस्ता-ए-ग़म और

साँचे में मसर्रत के ढला है ग़म-ए-उल्फ़त
ऐ गर्दिश-ए-आफ़ाक़ मुझे दे कोई ग़म और

अव्वल तो बिछड़ते ही चले जाते हैं साथी
पड़ता है बुरा वक़्त तो हो जाते हैं कम और

हालात मुआफ़िक़ नज़र आते नहीं 'क़ैसर'
हैं तरकश-ए-अय्याम में कुछ तीर-ए-सितम और