उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haalat par nigah ruton par nazar na thi

हालात पर निगाह रुतों पर नज़र न थी

حالات پر نگاہ رتوں پر نظر نہ تھی

शायर: Hafeez Shahid7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हालात पर निगाह रुतों पर नज़र न थी
जब तक रहे चमन में चमन की ख़बर न थी

ख़ुद अपने घर को आग दिखाई थी आप ने
इस में तो कोई साज़िश-ए-बर्क़-ओ-शरर न थी

रूदाद-ए-तीरा-बख़्ती-ए-अहबाब क्या कहें
उन के लिए सहर भी तुलू-ए-सहर न थी

फ़स्ल-ए-बहार में तर-ओ-ताज़ा नहीं हवा
शायद शजर को ख़्वाहिश-ए-बर्ग-ओ-समर न थी

टूटी हुई उमीद शिकस्ता थे हौसले
दिल की तबाहियों पे मगर आँख तर न थी

दश्त-ए-तलब में इतने अंधेरे थे कारगर
रख़्शंदा इक किरन भी सर-ए-रहगुज़र न थी

फिर क्यूँ सुना दिया था अदालत ने फ़ैसला
'शाहिद' मिरी गवाही अगर मो'तबर न थी