उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gulshan ki faqat phulon se nahin kanTon se bhi zinat hoti hai

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है

گلشن کی فقط پھولوں سے نہیں کانٹوں سے بھی زینت ہوتی ہے

शायर: Saba Afghani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है
जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है

हर शाम-ओ-सहर क़ुर्बां जिस पर दुनिया-ए-मसर्रत होती है
वो पैकर-ए-राहत क्या जाने कैसी शब-ए-फ़ुर्क़त होती है

ऐ वाइज़-ए-नादाँ करता है तू एक क़यामत का चर्चा
याँ रोज़ निगाहें मिलती हैं याँ रोज़ क़यामत होती है

करना ही पड़ेगा ज़ब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आँसू
फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ से ऐ नादाँ तौहीन-ए-मोहब्बत होती है

वो पुर्सिश-ए-ग़म को आए हैं कुछ कह न सकूँ चुप रह न सकूँ
ख़ामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दूँ तो शिकायत होती है

ऐ दोस्त जुदाई में तेरी कुछ ऐसे भी लम्हे आते हैं
सेजों पे भी तड़पा करता हूँ काँटों पे भी राहत होती है

जो आ के रुके दामन पे 'सबा' वो अश्क नहीं है पानी है
जो अश्क न छलके आँखों से उस अश्क की क़ीमत होती है